शाम

कल शाम से बेचैन था कि शाम क्यूँ न हो रही,
क्यूँ दिन के उजालों में ये दुनिया है खो रही?
नींद हो चुकी है गुम, ये इल्म ना किसी को अब,
अब शाम तो है रूबरू पर नींद सबकी सो रही।


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Dead stars

1, 2, 3… Karishma started counting the stars as she sat down on the roof. She wanted to do it since long, but couldn’t. For, on the one hand, her mom (whom she calls Maa) has always been a light-sleeper and will not let her go up on the roof late at night. And on the other, she has to wake up early in the morning to get ready for her school. But then the Coronavirus pandemic changed everything. Her school got closed, and all the course materials are now sent to her through emails. Maa has transformed into a heavy sleeper, maybe because she was accumulating her sleep debts all these times to be completed during a lockdown someday. On the contrary, her dad (Baba, according to her) had always been a heavy sleeper. He won’t wake up until someone goes and shouts directly into his ears. Continue reading “Dead stars”

बदलाव

जात-पात के अंतर में, तुम नाहक ही क्यूँ पड़ते हो?
इंसान वही है अंदर से, किरदार बदलता रहता है।

ये है महंगा वो है सस्ता, मोल-भाव क्यूँ करते हो?
एक सीट से जीता है तो, सरकार बदलता रहता है।

ऐसे काटा वैसे लूटा, किसके ऊपर हँसते हो?
न्याय समय ही करता है, हथियार बदलता रहता है। Continue reading “बदलाव”

धर्म

जब ये दुनिया बस बनी ही थी और यहाँ कुछ भी नहीं था, इंसान भी नहीं, तो तब धर्म भी नहीं ही होंगे। जब बाकी सब चीज़ों के साथ इस धरती पर इंसान की भी उत्पत्ति हुई, तब सभी इंसान एक जैसे ही रहे होंगे। हाँ नर-नारी, सुन्दर-कुरूप, स्थूल-कृश जैसे शारीरिक भेद जरूर रहे हो सकते हैं, पर जात-पात जैसी कोई धारणा तो उनमें नहीं ही प्रचलित होगी।

भावनाओं का जन्म तो इंसान के साथ ही हो जाता है, लेकिन उन्हें समझने और व्यक्त करने की क्षमता समय के साथ मस्तिष्क का विकास होने पर प्रगाढ़ होती है। यही विकास थोड़ा और हुआ होगा तो उनमें अपना-पराया, सच-झूठ जैसी समझ भी विकसित हुई होगी। इसी के चलते वक़्त के साथ-साथ अब उन्हें अच्छे-बुरे का भेद भी समझ आने लग गया होगा। और इन सभी के आधार पर फिर उन इंसानों ने एक-दूसरे से संवाद स्थापित करके रिश्ते बनाये होंगे। धीरे-धीरे फिर इसी तरह विश्व के अलग-अलग कोनों में अनेक सभ्यताओं का निर्माण हुआ होगा। जहाँ लोगों ने अपने परिवार बसाये होंगे और उनके लिए रोटी, कपड़ा, मकान और ऐसी अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था करने के प्रयास किये होंगे। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, और इसी के परिणामस्वरूप बहुत सी कलाओं, तकनीकों और उपकरणों का ईजाद हुआ होगा। Continue reading “धर्म”

नींद

दिल में इक बोझ, और आँखों में नींद लिए चल रहे हैं।
यूँ तो बुझ चुके हैं कबके, लेकिन हम आज भी जल रहे हैं।

चल लेना

कभी आगे चल लेना मेरे, तो कभी पीछे भी तू चल लेना,
पर पल-दो-पल के लिए तो कभी साथ मेरे भी चल लेना।
वक़्त देख के तो चलती है, दुनिया ये पागल सारी,
पर तू इससे हो के परे तो कभी साथ मेरे भी चल लेना। Continue reading “चल लेना”